UPTET शिक्षकों के समायोजन पर एक शिक्षक ने कोर्ट प्रक्रिया पर यह जानकारी दी hai
उचित जानकारी रीट संख्या पर कोर्ट की वास्तविक कार्यवाही के आधार पर दी जाएगी।
माननीय इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के अनुपालन में उत्तर प्रदेश सरकार ने बेसिक शिक्षा विभाग के शिक्षकों के समायोजन की प्रक्रिया को और अधिक व्यवस्थित रूप देने के लिए नया शासनादेश जारी किया है।
WRIT-A नंबर 179 ऑफ 2026 (अरुण प्रताप सिंह एवं 37 अन्य बनाम राज्य उत्तर प्रदेश) सहित अन्य जुड़ी याचिकाओं पर न्यायमूर्ति मैडम मंजू रानी चौहान जी द्वारा 17 फरवरी 2026 को दिए गए विस्तृत फैसले के बाद अब मामले के डिवीजन बेंच में जाने पर डिवीजन बेंच के अंतरिम आदेश के अनुपालन में 22 अप्रैल 2026 के अदालती आदेश के अनुसार शासन ने 4 मई 2026 को नया विस्तृत शासनादेश जारी किया है। इस आदेश में 30 अप्रैल 2026 की छात्र संख्या के आधार पर पूरे प्रदेश में शिक्षकों के समायोजन की प्रक्रिया को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया गया है।
हाईकोर्ट के फैसले में याचिकाकर्ताओं की मुख्य चुनौती 14 नवंबर 2025 के सरकारी आदेश पर थी, जिसमें शिक्षकों को सरप्लस मानकर विभिन्न स्कूलों में समायोजित किया जा रहा था। याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया था कि जुलाई 2025 में 23.05.2025 के आदेश के तहत समायोजन पहले ही पूरा हो चुका था, मध्य सत्र में नया अभ्यास गैरकानूनी है, प्रक्रिया में पारदर्शिता नहीं है, विकल्प नहीं दिए गए, ‘Last Come First Go’ का पालन नहीं हो रहा है और हेडमास्टरों को भी अनुचित तरीके से सरप्लस घोषित किया जा रहा है। उन्होंने रीना सिंह मामले (2019 (1) ADJ 319 LB) और पुष्कर सिंह चंदेल एवं राहुल पाण्डेय आदि मामले (2024 (12) ADJ 375 LB) का हवाला देते हुए कहा था कि जूनियर शिक्षकों को यांत्रिक रूप से विस्थापित करना और शिक्षा मित्रों को गिनती में शामिल करना गलत है।
राज्य सरकार ने दलील दी कि आरटीई एक्ट 2009 की धारा 25 के तहत प्रत्येक स्कूल में कम से कम दो शिक्षक सुनिश्चित करना राज्य का संवैधानिक दायित्व है। अनुच्छेद 21A के तहत बच्चों का शिक्षा का अधिकार शिक्षकों के व्यक्तिगत हित से ऊपर है। माननीय हाईकोर्ट ने इन दलीलों को स्वीकार करते हुए 14.11.2025 का सरकारी आदेश वैध ठहराया और कहा कि यह आदेश आरटीई एक्ट के उद्देश्य की पूर्ति के लिए जारी किया गया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि 23.05.2025 का आदेश विकल्प आधारित था जबकि 14.11.2025 का आदेश सुधारात्मक और अनिवार्य है। दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। कोर्ट ने नीति निर्माण में कार्यपालिका को व्यापक क्षेत्राधिकार देते हुए कहा कि जब तक नीति मनमानी या भेदभावपूर्ण न हो, अदालत को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।
माननीय हाईकोर्ट ने याचिकाएं मुख्य रूप से खारिज करते हुए याचिकाकर्ताओं को राहत देते हुए निर्देश दिया कि वे सात दिन के अंदर जिला स्तरीय समिति के समक्ष विस्तृत प्रतिनिधित्व दें और समिति एक माह के अंदर कारणों सहित आदेश पारित करे। समायोजन UDISE+ डेटा, छात्र संख्या और वास्तविक जरूरत के आधार पर निष्पक्ष एवं पारदर्शी तरीके से होना चाहिए।
इसी फैसले और डिवीजन बेंच के अंतरिम आदेश के अनुपालन में जारी नए शासनादेश में अब बहुत स्पष्ट प्रक्रिया निर्धारित की गई है। 30 अप्रैल 2026 की छात्र संख्या के भौतिक सत्यापन के आधार पर प्रत्येक जिले में प्राथमिक एवं उच्च प्राथमिक विद्यालयों के लिए अलग-अलग चार्ट तैयार किए जाएंगे, जिसमें स्कूल का नाम, स्वीकृत पद, वर्तमान में तैनात शिक्षक, जॉइनिंग डेट, छात्र संख्या, आरटीई के अनुसार आवश्यक शिक्षक संख्या और सरप्लस शिक्षकों के नाम दर्ज होंगे।
शिक्षकों को आपत्ति दर्ज करने का पर्याप्त अवसर दिया गया है। जिन शिक्षकों का स्थानांतरण प्रस्तावित है, वे 13 मई 2026 तक ऑफलाइन माध्यम से जिला स्तरीय समिति को अपनी आपत्ति दर्ज करा सकते हैं। जिला स्तरीय समिति (जिसकी अध्यक्षता जिला मजिस्ट्रेट करेंगे) इन आपत्तियों का निस्तारण करेगी और आवश्यकता अनुसार सरप्लस शिक्षकों को अन्य संस्थाओं में समायोजित करेगी, ताकि हर विद्यालय में कम से कम दो शिक्षक उपलब्ध हो सकें।
आदेश में विशेष प्रावधान महिलाओं के लिए भी किया गया है। महिला शिक्षिकाओं को पुनः तैनाती के समय पहले उसी विकास खंड में और यदि संभव न हो तो निकटतम विकास खंड में, सड़क से अच्छी तरह जुड़े स्कूल में तैनात करने का प्रयास किया जाएगा। जिन विद्यालयों में पहले से ही दो शिक्षक उपलब्ध हैं, वहां गैर-सरप्लस शिक्षकों को प्रभावित नहीं किया जाएगा।
समिति को यह भी निर्देश दिए गए हैं कि वर्तमान में जहां दो शिक्षक उपलब्ध हैं, वहां पुनः तैनाती नहीं की जाएगी। डेटा सत्यापन की जिम्मेदारी खंड शिक्षा अधिकारी और संबंधित प्रधानाध्यापक/वरिष्ठ अध्यापक की होगी। पूरा डेटा 6 मई 2026 तक जिला स्तरीय समिति को उपलब्ध कराया जाएगा। समिति द्वारा लिए गए निर्णय को जिला स्तरीय आधिकारिक वेबसाइट पर प्रकाशित किया जाएगा।
यह शासनादेश 22 मई 2026 को कोर्ट में सुनवाई के लिए भी महत्वपूर्ण है। इसमें स्पष्ट किया गया है कि यह अभ्यास वर्तमान में न्यूनतम दो शिक्षक उपलब्ध कराने की प्रक्रिया से अलग रखा जा सकता है और उसकी स्थिति कोर्ट को अगली तारीख पर बताई जाएगी।
इस पूरे मामले में माननीय हाईकोर्ट ने बच्चों के शिक्षा अधिकार को सर्वोच्च प्राथमिकता दी है, साथ ही शिक्षकों को अपनी व्यक्तिगत कठिनाइयों को जिला स्तर पर उठाने का उचित और पर्याप्त अवसर भी प्रदान किया है। नए शासनादेश में प्रक्रिया को और अधिक पारदर्शी, समयबद्ध और संवेदनशील बनाने का प्रयास किया गया है। अब शिक्षकों को 13 मई 2026 तक अपनी आपत्तियां दर्ज करने का मौका मिल गया है और जिला स्तरीय समिति को विस्तृत जिम्मेदारी सौंपी गई है।
यह व्यवस्था पूरे प्रदेश के बेसिक स्कूलों में Pupil-Teacher Ratio को सही ढंग से लागू करने की दिशा में एक ठोस कदम है। यदि जिस जिले में कनिष्ठ शिक्षक शिक्षिकाओं को सरप्लस किया जाता है तो शिक्षक शिक्षिका अब अपने जिले की समिति के समक्ष पूर्ण दस्तावेज, डेटा और कानूनी हवाले (रीना सिंह एवं पुष्कर सिंह चंदेल मामले सहित) के साथ representation देकर राहत प्राप्त कर सकते हैं। अंततः कोर्ट और सरकार दोनों का जोर बच्चों की बेहतर शिक्षा और गुणवत्तापूर्ण शिक्षण व्यवस्था पर है, जिसमें शिक्षकों की उचित तैनाती सुनिश्चित की जा रही है।
वस्तुतः कई जनपद वरिष्ठ शिक्षक शिक्षिकाओं को समायोजित कर रहे हैं इसलिए ऐसे जिलों में कोई भी विधिक अड़चन नहीं है। वरिष्ठ शिक्षक शिक्षिकाओं के समायोजन को नहीं रोका जा सकता है।
यह पूरा प्रकरण शिक्षकों के समायोजन, आरटीई एक्ट के कार्यान्वयन और न्यायपालिका-कार्यपालिका के समन्वय का एक महत्वपूर्ण उदाहरण बन गया है। अब 22 मई 2026 को डिवीजन बेंच में मामले की अगली सुनवाई होगी, जहां इन सभी प्रक्रियाओं की रिपोर्ट प्रस्तुत की जाएगी।
राहुल पांडे अविचल
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माननीय इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के अनुपालन में उत्तर प्रदेश सरकार ने बेसिक शिक्षा विभाग के शिक्षकों के समायोजन की प्रक्रिया को और अधिक व्यवस्थित रूप देने के लिए नया शासनादेश जारी किया है।
WRIT-A नंबर 179 ऑफ 2026 (अरुण प्रताप सिंह एवं 37 अन्य बनाम राज्य उत्तर प्रदेश) सहित अन्य जुड़ी याचिकाओं पर न्यायमूर्ति मैडम मंजू रानी चौहान जी द्वारा 17 फरवरी 2026 को दिए गए विस्तृत फैसले के बाद अब मामले के डिवीजन बेंच में जाने पर डिवीजन बेंच के अंतरिम आदेश के अनुपालन में 22 अप्रैल 2026 के अदालती आदेश के अनुसार शासन ने 4 मई 2026 को नया विस्तृत शासनादेश जारी किया है। इस आदेश में 30 अप्रैल 2026 की छात्र संख्या के आधार पर पूरे प्रदेश में शिक्षकों के समायोजन की प्रक्रिया को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया गया है।
हाईकोर्ट के फैसले में याचिकाकर्ताओं की मुख्य चुनौती 14 नवंबर 2025 के सरकारी आदेश पर थी, जिसमें शिक्षकों को सरप्लस मानकर विभिन्न स्कूलों में समायोजित किया जा रहा था। याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया था कि जुलाई 2025 में 23.05.2025 के आदेश के तहत समायोजन पहले ही पूरा हो चुका था, मध्य सत्र में नया अभ्यास गैरकानूनी है, प्रक्रिया में पारदर्शिता नहीं है, विकल्प नहीं दिए गए, ‘Last Come First Go’ का पालन नहीं हो रहा है और हेडमास्टरों को भी अनुचित तरीके से सरप्लस घोषित किया जा रहा है। उन्होंने रीना सिंह मामले (2019 (1) ADJ 319 LB) और पुष्कर सिंह चंदेल एवं राहुल पाण्डेय आदि मामले (2024 (12) ADJ 375 LB) का हवाला देते हुए कहा था कि जूनियर शिक्षकों को यांत्रिक रूप से विस्थापित करना और शिक्षा मित्रों को गिनती में शामिल करना गलत है।
राज्य सरकार ने दलील दी कि आरटीई एक्ट 2009 की धारा 25 के तहत प्रत्येक स्कूल में कम से कम दो शिक्षक सुनिश्चित करना राज्य का संवैधानिक दायित्व है। अनुच्छेद 21A के तहत बच्चों का शिक्षा का अधिकार शिक्षकों के व्यक्तिगत हित से ऊपर है। माननीय हाईकोर्ट ने इन दलीलों को स्वीकार करते हुए 14.11.2025 का सरकारी आदेश वैध ठहराया और कहा कि यह आदेश आरटीई एक्ट के उद्देश्य की पूर्ति के लिए जारी किया गया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि 23.05.2025 का आदेश विकल्प आधारित था जबकि 14.11.2025 का आदेश सुधारात्मक और अनिवार्य है। दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। कोर्ट ने नीति निर्माण में कार्यपालिका को व्यापक क्षेत्राधिकार देते हुए कहा कि जब तक नीति मनमानी या भेदभावपूर्ण न हो, अदालत को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।
माननीय हाईकोर्ट ने याचिकाएं मुख्य रूप से खारिज करते हुए याचिकाकर्ताओं को राहत देते हुए निर्देश दिया कि वे सात दिन के अंदर जिला स्तरीय समिति के समक्ष विस्तृत प्रतिनिधित्व दें और समिति एक माह के अंदर कारणों सहित आदेश पारित करे। समायोजन UDISE+ डेटा, छात्र संख्या और वास्तविक जरूरत के आधार पर निष्पक्ष एवं पारदर्शी तरीके से होना चाहिए।
इसी फैसले और डिवीजन बेंच के अंतरिम आदेश के अनुपालन में जारी नए शासनादेश में अब बहुत स्पष्ट प्रक्रिया निर्धारित की गई है। 30 अप्रैल 2026 की छात्र संख्या के भौतिक सत्यापन के आधार पर प्रत्येक जिले में प्राथमिक एवं उच्च प्राथमिक विद्यालयों के लिए अलग-अलग चार्ट तैयार किए जाएंगे, जिसमें स्कूल का नाम, स्वीकृत पद, वर्तमान में तैनात शिक्षक, जॉइनिंग डेट, छात्र संख्या, आरटीई के अनुसार आवश्यक शिक्षक संख्या और सरप्लस शिक्षकों के नाम दर्ज होंगे।
शिक्षकों को आपत्ति दर्ज करने का पर्याप्त अवसर दिया गया है। जिन शिक्षकों का स्थानांतरण प्रस्तावित है, वे 13 मई 2026 तक ऑफलाइन माध्यम से जिला स्तरीय समिति को अपनी आपत्ति दर्ज करा सकते हैं। जिला स्तरीय समिति (जिसकी अध्यक्षता जिला मजिस्ट्रेट करेंगे) इन आपत्तियों का निस्तारण करेगी और आवश्यकता अनुसार सरप्लस शिक्षकों को अन्य संस्थाओं में समायोजित करेगी, ताकि हर विद्यालय में कम से कम दो शिक्षक उपलब्ध हो सकें।
आदेश में विशेष प्रावधान महिलाओं के लिए भी किया गया है। महिला शिक्षिकाओं को पुनः तैनाती के समय पहले उसी विकास खंड में और यदि संभव न हो तो निकटतम विकास खंड में, सड़क से अच्छी तरह जुड़े स्कूल में तैनात करने का प्रयास किया जाएगा। जिन विद्यालयों में पहले से ही दो शिक्षक उपलब्ध हैं, वहां गैर-सरप्लस शिक्षकों को प्रभावित नहीं किया जाएगा।
समिति को यह भी निर्देश दिए गए हैं कि वर्तमान में जहां दो शिक्षक उपलब्ध हैं, वहां पुनः तैनाती नहीं की जाएगी। डेटा सत्यापन की जिम्मेदारी खंड शिक्षा अधिकारी और संबंधित प्रधानाध्यापक/वरिष्ठ अध्यापक की होगी। पूरा डेटा 6 मई 2026 तक जिला स्तरीय समिति को उपलब्ध कराया जाएगा। समिति द्वारा लिए गए निर्णय को जिला स्तरीय आधिकारिक वेबसाइट पर प्रकाशित किया जाएगा।
यह शासनादेश 22 मई 2026 को कोर्ट में सुनवाई के लिए भी महत्वपूर्ण है। इसमें स्पष्ट किया गया है कि यह अभ्यास वर्तमान में न्यूनतम दो शिक्षक उपलब्ध कराने की प्रक्रिया से अलग रखा जा सकता है और उसकी स्थिति कोर्ट को अगली तारीख पर बताई जाएगी।
इस पूरे मामले में माननीय हाईकोर्ट ने बच्चों के शिक्षा अधिकार को सर्वोच्च प्राथमिकता दी है, साथ ही शिक्षकों को अपनी व्यक्तिगत कठिनाइयों को जिला स्तर पर उठाने का उचित और पर्याप्त अवसर भी प्रदान किया है। नए शासनादेश में प्रक्रिया को और अधिक पारदर्शी, समयबद्ध और संवेदनशील बनाने का प्रयास किया गया है। अब शिक्षकों को 13 मई 2026 तक अपनी आपत्तियां दर्ज करने का मौका मिल गया है और जिला स्तरीय समिति को विस्तृत जिम्मेदारी सौंपी गई है।
यह व्यवस्था पूरे प्रदेश के बेसिक स्कूलों में Pupil-Teacher Ratio को सही ढंग से लागू करने की दिशा में एक ठोस कदम है। यदि जिस जिले में कनिष्ठ शिक्षक शिक्षिकाओं को सरप्लस किया जाता है तो शिक्षक शिक्षिका अब अपने जिले की समिति के समक्ष पूर्ण दस्तावेज, डेटा और कानूनी हवाले (रीना सिंह एवं पुष्कर सिंह चंदेल मामले सहित) के साथ representation देकर राहत प्राप्त कर सकते हैं। अंततः कोर्ट और सरकार दोनों का जोर बच्चों की बेहतर शिक्षा और गुणवत्तापूर्ण शिक्षण व्यवस्था पर है, जिसमें शिक्षकों की उचित तैनाती सुनिश्चित की जा रही है।
वस्तुतः कई जनपद वरिष्ठ शिक्षक शिक्षिकाओं को समायोजित कर रहे हैं इसलिए ऐसे जिलों में कोई भी विधिक अड़चन नहीं है। वरिष्ठ शिक्षक शिक्षिकाओं के समायोजन को नहीं रोका जा सकता है।
यह पूरा प्रकरण शिक्षकों के समायोजन, आरटीई एक्ट के कार्यान्वयन और न्यायपालिका-कार्यपालिका के समन्वय का एक महत्वपूर्ण उदाहरण बन गया है। अब 22 मई 2026 को डिवीजन बेंच में मामले की अगली सुनवाई होगी, जहां इन सभी प्रक्रियाओं की रिपोर्ट प्रस्तुत की जाएगी।
राहुल पांडे अविचल
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